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    काठमांडू में आग और अफरा-तफरी : भारतीय पर्यटक दहशत में फँसे, सरकार ने शुरू की वापसी की जद्दोजहद

     

    नेपाल की राजधानी काठमांडू इस समय भीषण अशांति की आग में जल रही है। सोशल मीडिया बैन और भ्रष्टाचार विरोधी प्रदर्शनों ने अचानक हिंसक रूप ले लिया और देखते ही देखते संसद भवन, सिंह दरबार और कई सरकारी ठिकानों पर प्रदर्शनकारियों ने कब्जा कर लिया। सड़कें आग और धुएँ से भर गईं, होटल जलाए गए और सेना को मोर्चा संभालना पड़ा। हालात इतने बिगड़े कि प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को इस्तीफा देना पड़ा और अंतरिम नेतृत्व न्यायमूर्ति सुशीला कार्की के हाथों में सौंपा गया।


    इस हिंसा के बीच सबसे अधिक संकट में पड़ गए हैं सैकड़ों भारतीय पर्यटक, जो घूमने आए थे और अब होटलों में बंद होकर खिड़कियों से जलता-काठमांडू देख रहे हैं। महाराष्ट्र और तेलंगाना से आए परिवारों ने बताया कि बाहर निकलना मौत को दावत देने जैसा है। होटल जला दिए गए, सड़क पर हर तरफ भीड़ और सुरक्षाबल, मोबाइल नेटवर्क ठप, और घरवालों से बात तक नहीं हो पा रही। कुछ ने तो भय के बीच दूतावास और पुलिस थानों में शरण ली।



    एयरपोर्ट बंद होने से वापसी की सारी उम्मीदें टूट गईं। सड़क मार्ग का विकल्प भी खतरनाक है क्योंकि रास्तों पर हिंसा और तलाशी का माहौल है। परिवारों की हालत खराब है—कोई भूख से जूझ रहा है, कोई दहशत से। पर्यटक अमोल और आशीष ने बताया कि उन्होंने लॉन्ड्री का आखिरी ऑर्डर भी खत्म कर दिया और अब समझ नहीं पा रहे कि कब लौट पाएँगे।


    हालांकि भारत सरकार हरकत में आई है। विदेश मंत्रालय ने यात्रा सलाह जारी करते हुए नेपाल न जाने की अपील की और जो वहाँ फँसे हैं, उन्हें होटल या सुरक्षित जगह पर रुकने की हिदायत दी। एअर इंडिया और इंडिगो को विशेष उड़ानें शुरू करने के निर्देश दिए गए हैं। 11 सितंबर से शेड्यूल्ड फ्लाइटें भी बहाल होंगी और धीरे-धीरे फँसे करीब हज़ार से ज्यादा भारतीयों को निकालने का प्रयास होगा।


    काठमांडू की सड़कों पर सेना का गश्त है, हर व्यक्ति की तलाशी ली जा रही है, लेकिन डर का आलम यह है कि कोई यह कह नहीं पा रहा कि हालात कब तक सुधरेंगे। भारत लौटने को बेताब परिवार दूतावास की हेल्पलाइन पर लगातार गुहार लगा रहे हैं। इस पूरे घटनाक्रम ने यह साफ कर दिया है कि विदेश यात्रा में अचानक उठी राजनीतिक आँधियाँ कैसे पलों में खुशी को डर में बदल देती हैं।


    आज काठमांडू सिर्फ जलते भवनों और चीखते लोगों का शहर नहीं है, बल्कि वहाँ फँसे भारतीयों के लिए यह इंतज़ार और बेबसी का पर्याय बन चुका है।

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